महक संस्था के रजत जयंती काव्य महोत्सव में गूंजी साहित्य की स्वर लहरियां
सवांददाता
रतलाम। नगर की अग्रणी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था महक कला, साहित्य एवं सांस्कृतिक मंच के स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में रजत जयंती काव्य महोत्सव का भव्य आयोजन गुलाब चक्कर में संपन्न हुआ। समारोह में साहित्य, संस्कृति एवं काव्य की विविध विधाओं का सुंदर संगम देखने को मिला तथा नगर एवं आसपास के कवियों, शायरों और साहित्य प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात साहित्यकार आलोक रंजन त्रिपाठी (इंदौर) थे, जबकि अध्यक्षता भूपेन्द्र सिंह राठौर (पूर्व डीएसपी) ने की। विशेष अतिथि के रूप में हरिशंकर भटनागर एवं प्रभुलाल रावल उपस्थित रहे। अतिथियों का स्वागत शाल, श्रीफल एवं पुष्पहार भेंट कर किया गया। इस अवसर पर साहित्यकार प्रभुलाल रावल की पुस्तक ‘सहज संस्कृति’ का विमोचन भी किया गया। मुख्य अतिथि आलोक रंजन त्रिपाठी ने कहा कि यह कृति भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों एवं आध्यात्मिक भावनाओं का उत्कृष्ट प्रस्तुतीकरण है। इसमें देवत्व एवं मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि ऐसी पुस्तकें केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि संग्रहणीय भी होती हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में भूपेन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि महक संस्था विगत 25 वर्षों से साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से समाज में सकारात्मक चेतना का संचार कर रही है। संस्था द्वारा बेटियों के सम्मान, व्याख्यानमाला, सांस्कृतिक आयोजनों एवं सामाजिक सरोकारों से जुड़े अनेक कार्य निरंतर किए जा रहे हैं। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. मोहन परमार ने पुस्तक समीक्षा प्रस्तुत करते हुए ‘सहज संस्कृति’ के साहित्यिक एवं वैचारिक पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पुस्तक की रचनाएं भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिक चिंतन की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। काव्य पाठ में झलकी संवेदनाएं, संस्कृति और राष्ट्रभाव रजत जयंती महोत्सव में कवियों एवं शायरों ने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अब्दुल सलाम खोखर ने बेटियों पर केंद्रित अपनी मार्मिक पंक्तियां सुनाईं— "खुशियों की जिंदगी में हवाले बहुत रहे, मुश्किलों में मुझे पूछने वाले बहुत रहे।" "उनके जन्म से उनकी विदाई के वक्त तक, बेटियां रहीं तो उजाले बहुत रहे।" सुनील निरंजन ने संस्था की साहित्यिक पहचान को स्वर देते हुए कहा— "महक को सरहदों में बांधना आसान नहीं होता, असली महक तो आप जैसे किरदारों से आती है।" "बातों में सादगी न रहे तो फिर, व्यवहार भी असरदार नहीं होता।" श्रीमती स्नेहलता धाकड़ ने बाल सुलभ शैली में प्रस्तुत किया— "रेल चली भाई रेल चली, दो पहियों की रेल चली।" "अजब निराली रेल चली, बड़ी ही प्यारी रेल चली।" संजय परसाई ‘सरल’ ने राष्ट्रभाव से ओतप्रोत रचना प्रस्तुत करते हुए कहा— "म्हारो वंदे मातरम् गान, यो तो बंकिम चंद्र को ज्ञान।" "देखो बीत गया डेढ़ सौ साल, फिर भी गूंजे राष्ट्र सम्मान।" काव्य पाठ में डॉ. मोहन परमार, सुरेश ठाकुर, हरिशंकर भटनागर, आई.एल. पुरोहित, श्रीराम दिवे, सतीश तिवारी (जावरा), नरेन्द्र पवार, पंकज व्यास, शान्तिलाल शान्तनु, कैलाश वशिष्ठ, गोपाल परमार, पवन शर्मा, वीरेन्द्र रावल एवं नरेन्द्र धाकड़ सहित अनेक रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। शायरों में अमीर उद्दीन अमीर, डॉ. फरीद शेख, तौफीक छिपा, फैजल खान, निसार पठान, शरीफ खोखर एवं शादाब खान ने अपनी ग़ज़लों से महफिल को यादगार बना दिया। कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन प्रदेश के लोकप्रिय मंच संचालक नरेन्द्र त्रिवेदी ने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप किया। इस अवसर पर महक संस्था द्वारा उन्हें शाल-श्रीफल एवं स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। साथ ही सभी अतिथियों का भी सम्मान किया गया। अंत में संस्था के संस्थापक अध्यक्ष मोडीराम सोलंकी ‘एकांत’ ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि साहित्य समाज को जोड़ने और संवेदनाओं को जीवित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है। रजत जयंती महोत्सव ने नगर के साहित्यिक परिवेश को नई ऊर्जा और नई दिशा प्रदान की।










