शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में भारतीय ज्ञान परम्परा की भूमिका पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ
सवांददाता
शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रतलाम में 20 फरवरी को वैश्वीकरण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा की भूमिका विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। उद्घाटन समारोह में अतिथियों ने मां वीणापाणि की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन किया। संगीत विभाग की छात्राओं ने मां शारदा की वंदना नृत्य प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. मंगलेश्वरी जोशी सहित अन्य शिक्षाविदों ने अतिथियों का स्वागत किया। संगोष्ठी समन्वयक डॉ. मणिक डांगे ने भारतीय ज्ञान परम्परा की व्यापकता और जीवनमूल्य आधारित दृष्टि पर प्रकाश डाला। इसके बाद शोध सारांश संकलन संचयिका तथा वाणिज्य विभाग की पत्रिका का विमोचन किया गया।
प्रथम वक्ता डॉ. पवन मिश्रा ने भारतीय ज्ञान परंपरा और बौद्धिक संपदा अधिकार पर विचार रखते हुए पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और उसके व्यावहारिक उपयोग की आवश्यकता बताई। द्वितीय वक्ता डॉ. चांदकिरण सलूजा ने शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परम्परा की भूमिका और चार स्तंभों—ज्ञान, सहअस्तित्व, मानवता और नैतिकता—को रेखांकित किया।
मुख्य वक्ता अश्विनी कुमार ने वैश्वीकरण और परम्परा के सम्मिश्रण पर बल दिया,वहीं डॉ. प्रदीप खरे ने भारतीय दार्शनिक चिंतन और भक्ति परंपरा की महत्ता समझाई। मुख्य अतिथि डॉ. वाय.के. मिश्रा ने शिक्षा में नैतिकता और प्राचीन संस्कृति को पुनः अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य डॉ. जोशी ने कहा कि संगोष्ठी ने गहन विषय को सहज रूप में प्रस्तुत कर नवचिंतन को जन्म दिया। कार्यक्रम में विभिन्न महाविद्यालयों के प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्राओं ने भाग लिया। संचालन डॉ. अनामिका सारस्वत ने किया और आभार डॉ. सुरेश चौहान ने व्यक्त किया।



















