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स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ।
स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में हुए आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
श्रीमद्भागवत कथा एवं प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती ने सत्संग, गुरु-निष्ठा, श्रद्धा, विवेक और आडंबर पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्संग केवल सुनने का विषय नहीं है, बल्कि संत की बात को सुनकर उसके साथ जीवन में चल पड़ना ही वास्तविक सत्संग है। उन्होंने धुंधकारी का उदाहरण देते हुए कहा कि उसने शरीर से नहीं, बल्कि सूक्ष्म शरीर से सत्संग सुना। उन्होंने श्रद्धालुओं से आत्मचिंतन करने का आह्वान करते हुए कहा कि जीवन में अनेक संतों का सत्संग करने के बाद भी यदि मोह-माया और प्रपंच नहीं छूटे तो यह विचार करना चाहिए कि सत्संग को जीवन में कितना उतारा गया है।
आचार्य ने कहा कि सत्संग से विवेक जागृत होता है, लेकिन इसके लिए संत और गुरु के प्रति श्रद्धा एवं निष्ठा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सत्संग के दो रूप हैं—एक संत की बात को सुनना और दूसरा उस बात को सुनकर संत के मार्ग के साथ हो जाना। केवल सुन लेने से जीवन में परिवर्तन नहीं आता, जब तक विचार और आचरण में उसका प्रभाव दिखाई न दे।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन अक्सर प्रदर्शन में बीत जाता है, जबकि आवश्यकता दर्शन की है। धर्म और अध्यात्म के नाम पर होने वाले आडंबर एवं दिखावे से बचने की सीख देते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति को बाहरी प्रदर्शन के बजाय अपने भीतर के परिवर्तन पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने बगुला भक्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि व्यक्ति एकांत में बैठा होने पर भी यदि उसका मन केवल संसार, परिवार, धन और इंद्रियों के विषयों में ही लगा रहता है तो उसकी साधना अधूरी है।
गुरु के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य ने कहा कि शास्त्रों में गुरु-शिष्य परंपरा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गुरु के मार्गदर्शन के बिना आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण नहीं हो सकती। उन्होंने श्रद्धालुओं को अपनी मान्यताओं और बुद्धि के अहंकार से ऊपर उठकर सत्य को समझने तथा संतों के प्रति श्रद्धा विकसित करने का संदेश दिया।
आध्यात्मिक दृष्टांतों के माध्यम से उन्होंने अहिल्या के सूक्ष्म शरीर, धुंधकारी तथा जड़भरत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि आध्यात्मिक चेतना केवल स्थूल शरीर तक सीमित नहीं है। उन्होंने जड़भरत के प्रसंग के माध्यम से बताया कि विभिन्न योनियों में रहने के बाद भी ज्ञान की चेतना का विकास संभव है और मनुष्य को अपने जीवन का उद्देश्य समझने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मनुष्य शरीर अत्यंत दुर्लभ है। जीवन समाप्त होने के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है, इसलिए जीवन रहते हुए आत्मज्ञान, विवेक और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
पांच पीढ़ियों से आश्रम से जुड़ा पापटवाल परिवार
प्रवचन के पश्चात श्रीजी पैलेस राम दरबार के भगत जीराज बाग, हरिसिंह चौहान अजमेर एवं राजेश गुप्ता सहित श्रद्धालुओं द्वारा स्वामी जी का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में प्रसादी की व्यवस्था फूला बाई पापटवाल एवं भोला रेस्टोरेंट, स्टेशन रोड की ओर से की गई।
महामंडलेश्वर देव स्वरूपानंद जी ने बताया कि पापटवाल परिवार श्री हीरालाल पापटवाल के माध्यम से पांच पीढ़ियों से आश्रम से जुड़ा हुआ है। परिवार की ओर से आश्रम में जनरेटर की व्यवस्था भी की गई है। अखंड ज्ञान आश्रम के देव स्वरूपानंद जी ने परिवार एवं सहयोगकर्ताओं को आशीर्वाद प्रदान किया।
आश्रम प्रबंधन ने बताया कि आश्रम में आयोजित होने वाले विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम भक्तों के सहयोग से ही संपन्न होते हैं। कार्यक्रम में आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु एवं भक्तजन उपस्थित रहे।










