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दिव्य चातुर्मास महोत्सव में बोले— सच्चे ज्ञान और दुखों के निवारण के लिए अखंड ज्ञान आश्रम की शरण आवश्यक
सैलाना बस स्टैंड स्थित स्वामी ज्ञानानंद मार्ग पर श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत रविवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर, परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद भारती जी महाराज ने कठोपनिषद एवं श्रीमद्भागवत कथा पर आधारित प्रेरणादायी प्रवचन दिए।
प्रातःकालीन प्रवचन में स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने कठोपनिषद की व्याख्या करते हुए पंचतत्त्व के आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि अग्नि तत्त्व तीन प्रमुख रूपों में विद्यमान है। पहला स्त्री में, क्योंकि दुर्गा जगदंबा स्वयं अग्नि स्वरूप हैं और वही दिव्य शक्ति प्रत्येक नारी में विद्यमान है। दूसरा ब्राह्मण में, क्योंकि ब्राह्मण के मुख में अग्नि का वास माना गया है, इसलिए ब्राह्मण किसी भी स्थिति में पूजनीय है। तीसरा अग्नि तत्त्व ऋषि, संत एवं महात्माओं में होता है, जिसके माध्यम से वे लोककल्याण के समस्त कार्य संपन्न करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इसी प्रकार आकाश सहित पंचतत्त्वों का संतुलन एवं नियंत्रण पंचदेव की आराधना के माध्यम से होता है।
सायंकाल आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में स्वामी जी ने कहा कि यदि जीवन में वास्तविक ज्ञान प्राप्त करना है तो अखंड ज्ञान आश्रम की शरण में आना आवश्यक है। उन्होंने महर्षि उद्दालक एवं उनके शिष्य उपमन्यु की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि गुरु की आज्ञा का पूर्ण पालन करने वाला शिष्य इतिहास में अमर हो जाता है।
उन्होंने कहा कि संसार का सृजन करने वाले ब्रह्मा भी पूर्णतः सुखी नहीं हैं, इसलिए केवल सांसारिक साधनों से सुख की प्राप्ति संभव नहीं है। वास्तविक आनंद और ज्ञान गुरु की कृपा तथा साधना से ही प्राप्त होता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान करते हुए कहा कि केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि साधना और आत्मपरिवर्तन के लिए आश्रम आएं और जीवन को आध्यात्मिक दिशा दें।
प्रवचन के दौरान स्वामी जी ने आदि गुरु भगवान् शंकराचार्य के अद्वितीय ज्ञान का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रसिद्ध विद्वान मैक्स मूलर भी उनके दर्शन की गहराई को पूरी तरह नहीं समझ सके। उन्होंने कहा कि जैसे नक्षत्रों की कल्पना सूर्य के बिना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार भारतीय ज्ञान परंपरा में आदि गुरु शंकराचार्य का स्थान सर्वोच्च है।
उन्होंने भारतीय वैदिक परंपरा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत ऋषि-परंपरा का देश है। हमारे वेदों और वैदिक साहित्य में प्राचीन काल से ही विज्ञान, यज्ञ, कृषि, धातुओं एवं जीवन-दर्शन का समृद्ध ज्ञान विद्यमान रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि गीता के अनुसार प्रपंच में भगवान मृत्यु के रूप में तथा अध्यात्म मार्ग पर चलने वालों के लिए अमृत स्वरूप हैं। ज्ञानियों के माध्यम से वही अमृत स्वरूप ज्ञान की प्राप्ति कराते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन के दुखों का वास्तविक समाधान आध्यात्मिक ज्ञान और साधना में निहित है तथा अखंड ज्ञान आश्रम इसी दिशा में साधकों का मार्गदर्शन कर रहा है।
सायंकालीन महाआरती में श्री सर्व ब्राह्मण सभा, रतलाम के नरेंद्र जोशी, शैलेंद्र तिवारी, राजेंद्र चास्ता, सुनीता पाठक, उषा दुबे, रजनी व्यास, उमाकांत उपाध्याय, रामकृष्ण शर्मा, सुरेश दवे, हंसा व्यास, शांतिलाल शर्मा, नवदीय शर्मा, मंजू जोशी, रानु तिवारी, आशा उपाध्याय, के.एल. भट्ट, सुनील गौतम, के.एल. आचार्य, वीरेंद्र कुलकर्णी, आईपी त्रिवेदी, सत्यनारायण पालीवाल, के.के. शर्मा सहित अनेक श्रद्धालुओं ने सहभागिता की। आरती के पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई। चातुर्मास महोत्सव में आश्रम के संतगण एवं बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु उपस्थित रहे।
स्वामी देव स्वरूपानंद जी ने बताया कि कल होगा सहस्त्रधारा अभिषेक
दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत सोमवार, 3 अगस्त को प्रातः 10 बजे परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद भारती जी महाराज के सानिध्य में 11 विद्वान पंडितों द्वारा सहस्त्रधारा अभिषेक संपन्न कराया जाएगा। आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर पुण्य लाभ प्राप्त करने का आग्रह किया है।



















