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आकांक्षा, संघर्ष और स्वप्न ही कहानी का यथार्थ - प्रो. रतन चौहान
विशेष संवाददाता
रतलाम। "कहानी मनुष्य की आकांक्षा, उसके जीवन संघर्ष और उसके सपनों की दास्तान होती है। एक कहानी के भीतर जीवन धड़कता है और उसके भीतर पूरी की पूरी एक कविता गति करती हुई दिखाई देती है।" उक्त विचार जनवादी लेखक संघ (जलेसं), रतलाम द्वारा आयोजित कहानी पाठ एवं विमर्श कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि व अनुवादक प्रो. रतन चौहान ने व्यक्त किए।
प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'वागर्थ' में प्रकाशित कथाकार आशीष दशोत्तर की चर्चित कहानी 'झुर्रियां' पर केंद्रित इस गरिमामय आयोजन में वक्ताओं ने कहानी के विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और कलात्मक पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
हाशिए पर धकेले जा रहे समाज की चिंता है 'झुर्रियां'
अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. रतन चौहान ने कहा कि समाज में व्याप्त विसंगतियों को एक संवेदनशील कहानीकार ही सामने लाता है। वह दिखाता है कि किस तरह संघर्षशील व्यक्ति को मुख्य धारा से दूर किया जा रहा है और पूरे वर्ग को उपेक्षा की ओर धकेला जा रहा है। कहानीकार अपने पात्रों के माध्यम से आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना को अभिव्यक्ति देता है, जिसकी बेहतरीन मिसाल कहानी 'झुर्रियां' है।
वरिष्ठ कवि श्याम माहेश्वरी ने इसे नवोन्मेष का सुंदर उदाहरण बताया, वहीं वरिष्ठ रंगकर्मी कैलाश व्यास ने प्रेमचंद के वक्तव्यों का हवाला देते हुए कहा कि यह कहानी हर मापदंड पर खरी उतरती है। वरिष्ठ शायर सिद्धीक़ रतलामी ने टिप्पणी की कि कहानी के पीछे चल रही अदृश्य कहानी को समझना ही इसकी वास्तविक सफलता है।
विद्वानों एवं समीक्षकों के विचार
परिचर्चा में शहर के कई प्रबुद्ध साहित्यकारों और विचारकों ने अपने मत रखे:
डॉ. गीता दुबे: "यह कहानी खाली हाथों के दर्द को उभारती है और ध्वस्त होते सपनों की दास्तान बयां करती है।"
मांगीलाल नगावत: "कहानी में सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेले गए मेहनतकश वर्ग का संघर्ष प्रमुखता से उभरा है।"
रणजीत सिंह राठौर (सचिव, जलेसं): "यह रचना लेखक की पिछली कहानियों से आगे की कड़ी है, जिसकी बुनावट स्थापित साहित्य की बानगी प्रस्तुत करती है।"
आई.एल. पुरोहित: "तांगे वाले के चरित्र के माध्यम से प्रशासनिक व सामाजिक व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर किया गया है।"
अन्य वक्ता: विनोद झालानी, नरेन्द्र सिंह डोडिया, दुष्यंत कुमार व्यास, आशा श्रीवास्तव, पुष्पलता शर्मा और कीर्ति शर्मा ने भी कहानी को भावप्रवण, प्रेरक और प्रभावी बताते हुए इसकी सफलता की सराहना की।
आधार कार्ड और मिटती रेखाओं का मर्मस्पर्शी यथार्थ
कार्यक्रम में कथाकार आशीष दशोत्तर ने स्वयं अपनी कहानी 'झुर्रियां' का पाठ किया। कहानी के मूल विषय पर बात करते हुए उन्होंने बताया कि यह एक ऐसे बुजुर्ग की व्यथा है, जिसकी हाथों की रेखाएं जीवन भर के कठोर परिश्रम में घिसकर मिट चुकी हैं। जब वह अपना आधार कार्ड बनवाने जाता है, तो बायोमेट्रिक फिंगरप्रिंट (अंगुलियों के निशान) न मिलने के कारण उसे जिस अमानवीय प्रक्रिया और मानसिक दौर से गुजरना पड़ता है, वही इस कहानी का केंद्र बिंदु है। श्री दशोत्तर ने कहा कि कहानी में 'इंटेंसिटी' (तीव्रता) और 'ड्रामा' का तत्व पाठकों को अंत तक बांधे रखता है।
कार्यक्रम की रूपरेखा एवं श्रद्धांजलि
आयोजन में शहर के कई गणमान्य नागरिक और रंगकर्मी मौजूद रहे, जिनमें वरिष्ठ रंगकर्मी ओमप्रकाश मिश्र, हीरालाल खराड़ी, सरिता दशोत्तर, एस.एन. सोढ़ा, गीता राठौर, एस.के. मिश्रा, कैलाश वशिष्ठ और कला डामोर प्रमुख थे।
कार्यक्रम का सफल संचालन जनवादी लेखक संघ के सचिव रणजीत सिंह राठौर ने किया तथा आभार प्रदर्शन जितेन्द्र सिंह पथिक द्वारा किया गया। सभा के अंत में जलेसं इंदौर के दिवंगत अध्यक्ष रजनीरमण शर्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
13 सितंबर को होगी 'तरही नशिस्त'
जनवादी लेखक संघ की उर्दू विंग के संयोजक सिद्धीक़ रतलामी ने जानकारी दी कि संगठन द्वारा शुरू की गई 'तरही नशिस्त' का तीसरा सोपान 13 सितंबर (रविवार) को प्रातः 11 बजे, शहीद भगत सिंह पुस्तकालय (शहर सराय, रतलाम) में आयोजित किया जाएगा।
इस तरही मुशायरे के लिए मिसरा तय किया गया है:
"फूलों से ज़ख़्म खाए हैं हमने बहार में"
उन्होंने रतलाम के सभी ग़ज़ल प्रेमियों और साहित्यकारों से इस मुशायरे में उपस्थित होने का आग्रह किया है।










