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त्याग से ही शांति और सुख की प्राप्ति : स्वामी विशोकानंद जी भारती
स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत सोमवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय तथा सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा एवं प्रवचन का आयोजन हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर धर्मलाभ लिया।
प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती ने कहा कि मनुष्य राग के माध्यम से सुख प्राप्त करना चाहता है, जबकि संतजन त्याग के माध्यम से सुख और शांति की बात करते हैं। पहले त्याग करना आवश्यक है, तभी वास्तविक शांति की प्राप्ति होती है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास का आयोजन भी लोकमंगल की भावना से किया जा रहा है, ताकि सभी का कल्याण हो।
उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का प्रसंग बताते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश इसलिए दिया कि वह भगवान की बात को स्वीकार कर अपने कर्तव्य का पालन करे। गीता का श्रवण करने के बाद अर्जुन ने भगवान से कहा कि अब मैं वही करूंगा, जो आप कहेंगे। उन्होंने कहा कि आत्मा बल-प्रयोग से प्राप्त नहीं होती, बल्कि साधना, ज्ञान और आत्मबोध से उसकी अनुभूति होती है।
स्वामी जी ने संत-महात्माओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान की भक्ति और आध्यात्मिक मार्ग संतों के सहारे ही आगे बढ़ता है। संन्यासी वह है जिसने सब कुछ त्याग दिया है। उन्होंने कहा कि जो स्वयं गिर रहा हो, वह दूसरे को कैसे संभाल सकता है। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में स्वयं को मजबूत और संयमित बनाना आवश्यक है।
श्रीमद्भागवत के महत्व को समझाते हुए उन्होंने कहा कि व्यास जी ने वेदों के सार को सरल रूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वेद दूध के समान हैं, ऋषियों ने उसे जमाया और व्यास जी ने उससे मक्खन के रूप में भागवत का सार निकालकर संसार को प्रदान किया। शास्त्रार्थ के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भागवत अद्वैत तत्व की ओर ले जाती है और अंततः द्वैत की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि अब केवल कथा सुनने वाले नहीं, बल्कि ‘भागवत पुरुष’ बनने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने भागवत का अर्थ बताते हुए कहा कि जो भगवान का हो गया, वही भागवत है। कथा और संतवाणी को श्रद्धापूर्वक सुनकर जब मनुष्य का जीवन भगवान के प्रति समर्पित होने लगता है, तब वह वास्तविक अर्थों में भागवत पुरुष बनने की दिशा में अग्रसर होता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान का मार्ग नारद जी जैसे ऋषियों ने संसार को प्रदान किया है और मनुष्य को भगवान का भक्त बनने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन के दौरान संन्यास, गुरु-शिष्य परंपरा और साधना के प्रसंगों के माध्यम से भी आध्यात्मिक जीवन की महत्ता समझाई गई। उन्होंने कहा कि बाहरी रूप से किसी परंपरा से जुड़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके मूल भाव और साधना को जीवन में उतारना आवश्यक है।
कार्यक्रम के अंत में आरती संपन्न हुई। इसके पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। ग्राम भजनखेड़ा निवासी मोहनलाल पाटीदार (मुरली वाला) परिवार द्वारा प्रसाद वितरण में सहयोग किया गया। आयोजन में आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष श्रद्धालु एवं भक्तजन उपस्थित रहे।













