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कहानी-शगुन ताई

बहुत दिनों बाद आज कलम हाथ में ली है। कई दिनों से मन में उथल-पुथल चल रही थी ,रह रह कर मां की बहुत याद आ रही थी । २ साल पहले ही तो स्वर्गवास हुआ है, यूं तो राखी पर घर जाना नहीं होता परंतु इस बार पुरानी यादें संजोने चली ही गई ।छोटा सा ही टूर था। 3 घंटे का सफर था इसीलिए ड्राइवर की व्यवस्था की गई, ताकि जल्दी जाकर लौट सकूं।
 |  न्यूज़ डेस्क

कहानी-शगुन ताई
बहुत दिनों बाद आज कलम हाथ में ली है। कई दिनों से मन में उथल-पुथल चल रही थी ,रह रह कर मां की बहुत याद आ रही थी । २ साल पहले ही तो स्वर्गवास हुआ है, यूं तो राखी पर घर जाना नहीं होता परंतु इस बार पुरानी यादें संजोने चली ही गई ।छोटा सा ही टूर था। 3 घंटे का सफर था इसीलिए ड्राइवर की व्यवस्था की गई, ताकि जल्दी जाकर लौट सकूं।
घर पहुंचने पर अब मां की जगह भाभी ने स्वागत किया।"सब कैसे हैं ससुराल में?" भैया ने पूछा,"कुशल मंगल है ,भैया" मैंने कहा। औपचारिक बातचीत हुई,अभी भाई आफिस से लंच में आए है,"शाम को मिल कर ढेर बातें करेंगे,"कहकर वे चले गए।
पूरे घर में घूम कर मां को महसूस किया,सब कुछ अच्छा ही लगा। बालकनी में गई तो अपने प्रिय पौधों को छूकर देखा ,फिर वही चाय आ गई और बैठक मंडली जम गई। भाभी से आस पड़ोस की सारी खबरें जुटाई। बातें करते हुए शगुन ताई का जिक्र भी आया, जिन्हें इस तरह भूलना तो बिल्कुल भी संभव नहीं था, या यूं कहें वे सदैव ह्रदय की गहराइयों में छिपी बैठी थी ।बस मौका मिलते ही उनकी याद ताजा हो जाती है।
मै भाभी को उनके बारे में बता ने लगी, हालांकि वे पहले भी ये सुन चुकी थी।मेरी उत्सुकता देख भाभी ने बताया"आपको बहुत याद करती है"। मैंने कहा-कोई मां अपने बच्चों को कैसे भूल सकती है?
भाभी रसोई व्यवस्था करने चली गई। मेरे भोजन में कुछ देर थी।इधर उधर की बातें सोचते हुए ,न जाने कब मन का चक्र बचपन में घूमने लगा। यह मन भी विचित्र है,प्रेम की ओर मुड़ता है।मन फिर से शगुन ताई को याद करने लगा। प्रिय सखी माधवी के घर उनसे परिचय हुआ था ,तब मैं बहुत छोटी रही होंगी ।कहने को वे अनपढ़ परंतु उनकी ममता की सौंधी खुशबू सीधे दिल तक पहुंचती थी। उनका नाम शायद केवल शगुन रहा होगा लेकिन अब हर परिचित के लिए वह शगुन ताई थी। उनका परिवार कहां है ,कैसा है, इन सब बातों से हम बच्चे कहां मतलब रखते थे। माधवी के परिवार में 5 सदस्य थे- माता-पिता ,लता दी, माधवी और चारू। मेरी इन तीनों बहनों से अच्छी दोस्ती थी । लता दी एवं चारू से उम्र में अंतर होने पर भी दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा। शगुन ताई के बारे में बस इतना ही मालूम चला कि उन्होंने इन तीनों को बचपन से ही संभाला है ।उस परिवार का अटूट हिस्सा बन चुकी थी वे। यूं तो कॉलोनी से दूर किराए के कमरे में अकेले रहती थी परंतु उनकी आत्मा तीनों बच्चों में ऐसे रम गई थी जैसे फूल में खुशबू ,कौन ,किस में कितना शामिल था ,कहना मुश्किल है। अंकल और आंटी दोनों ही नौकरी पेशा थे ।पीछे से सारे घर की देखरेख शगुन ताई बहुत कुशलता से करती थी। सारे काम व्यवस्थित रूप से पूरे होते थे ।सजगता के साथ घर की चौकीदारी भी करती थी। उनके रहते घर से कोई सामान इधर उधर हो जाए ,अंश भर भी संभावना नहीं थी ।गरीब अवश्य थी परंतु दिल में सारी दुनिया समाई हुई थी।'वसुधैव कुटुंबकम' इस उक्ति को अपने कार्यों से उन्होंने सिद्ध कर दिया था। सीमित आमदनी में भी अपने पैसों से पता नहीं कैसे बच्चों के लिए खाने पीने का सामान ले आती और उनके मुख पर तृप्ति के भाव देखकर परम सुख का अनुभव करती थी।माधवी और उसकी दोनों बहने भी ताई पर बहुत मन रखती थी ।ताई से नाराज भी होते थे और उन्हीं से ही मानते थे, विचित्र प्रेम था उनका।
इस संबंध को देखकर लगता यशोदा मां और कृष्ण का प्यार भी इतना ही पवित्र रहा होगा ।मुझे याद आता है जब लता दी बीमार थी और परीक्षा सिर पर थी ,उनकी उदासी को उस अनपढ़ मां ने पढ़ लिया ,न जाने कितने मंदिरों में पूजा-अर्चना कर आई ।माधवी भी स्कूल से घर लौट कर सबसे पहले उन्हीं से मिलना चाहती और ताई तो मानो शबरी की तरह प्रतीक्षा पूरी करती ,बच्चों के थोड़ा सा भी देर होने पर उनकी खोज खबर लेने निकल पड़ती ।सबसे छोटी चारू भी दिन भर आगे पीछे ही घूमती रहती थी, दूध पीना है, खाना है तो सिर्फ शगुन ताई के साथ। बच्चों का किसी से यदि स्कूल में झगड़ा हो गया है तो ताई कुछ कर तो सकती है नहीं, केवल उन अनजान बच्चों को कोस कोस कर अपने मन को तसल्ली देती और इसी बात में तीनों बहनें भी संतुष्ट हो जाती, शायद उन्हें भ्रम होता कि कोई हल तो निकल ही गया है।
ताई ने न केवल उनके यहां बल्कि हम लोगों से भी प्रेम का संबंध जोड़ रखा था। मां के सिर में दर्द हो और ताई को पता ना चले यह असंभव था। आसपास किसी के घर मृत्यु होती तो सबसे ज्यादा दुख ताई को ही होता ।खून का रिश्ता नहीं था लेकिन मानो नेह बंधन निभाने ही ईश्वर ने उनकी रचना की थी। माधवी की मां का बड़ा सहारा थी ताई। कामकाजी महिला की परेशानियों को समझती थी और समय-समय पर अपनी देहाती भाषा में उनका हौंसला भी बढ़ाती थी। उनके घर लौटने पर ही वे बच्चों को छोड़ अपने घर जाती थी।
शादी के बाद हम सहेलियां अलग हो गई लेकिन माधवी से फोन पर संपर्क बना रहा। उसी से मालूम चला कि प्रेगनेंसी के दौरान भी शगुन ताई ने बहुत ख्याल रखा और अब तो नाती ,नातिन भी ताई को शगुन ताई ही पुकारने लगे ।
उनके दिल में तो मानो प्रेम का सोता था जो कभी खत्म ही नहीं होता, यहां तक कि बच्चे भी नानी के घर शगुन ताई के बिना नहीं रह पाते ।ताई के बारे में बातें करना, उनकी अच्छाइयां लिखना, मानो बस समुद्र की बूंदों को गिनना हैं।
भाभी ने खाने के लिए पुकारा , वर्तमान में लौट आई।खाना खाते हुए भाभी से कहा कि चलो लगे हाथ ताई से मिल ही आऊं। कार्य की अधिकता से भाभी साथ ना आ सकी, माधवी के घर पहुंचने पर चारू ने दरवाजा खोला। अंकल, आंटी और ताई से मिल कर बहुत संतोष हुआ।सब की कुशल मंगल पूछी,बढ़ती उम्र में विशेष ध्यान रखने का अनुग्रह किया।ताई भी मुझसे गले मिल कर आशीष देने लगी,मेरी खैरियत जान हर राखी पर ना आने का प्यार भरा उलाहना दिया। उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि मेरे सुखमय जीवन से उन्हें अपार सुख है। विदा लेते पुनः चरणस्पर्श करने पर ढेर आशीर्वाद मिले, साथ ही अपनी गांठ से सामर्थ्य अनुसार बीस रूपए भी दिए। बेटी खाली हाथ नहीं जाती,इस रस्म को भी निभाया , आंखें बंधन तोड़ बहने को व्याकुल हुई, स्नेह झोली में समेटे ,फोन करते रहने का वादा कर विदा ली। आंखों की नमी ताई ने भी छिपा ली।
शाम हो रही थी, भैया आ चुके थे। काम निपटा कर देर रात तक महफ़िल जमी,ताश खेला, बातें की।
अगली सुबह भाभी के साथ काम में सहयोग करते वक्त याद आया मेथीदाना ताई को बेहद पसंद है। भाभी ने हंस कर बात सुनी और आश्वासन दिया कि जब भी बनाएगी ताई के लिए भिजवा देंगी।राखीत्यौहार बनाकर शीघ्र ही अपने घर लौट आई।
आज भी विचार करती हूं ,
स्वार्थी दुनिया में शगुन ताई जैसे लोग भी हो सकते हैं क्या ?अभाव में रहकर भी कभी शिकायत नहीं, जिन्हें दूसरों का सुख सुखी करता है और दूसरों का दुख भी घंटों अश्रु बहाने पर मजबूर करता है।
उनकी कहानी ईश्वर कब तक चलाएगा ,यह वही जाने बस यही कामना है, वे सदैव स्वस्थ रहें, उनसे संसार सीख सकें कि कैसे जिया जाता है। ताईं की स्मृति मेरे ह्रदय में सदैव ममतामयी मां की छवि के रूप में विराजमान रहेगी।
बाहर बादलों की गरजने की आवाज सुनाई दे रही है। कलम को विराम देना होगा। शगुन ताई यह नाम मन में गुनगुनाते हुए दिल को शांति मिल रही है। मन में कहीं एक इच्छा है कि यदि पुत्री हुई तो मैं भी उसका नाम शगुन ही रखूंगी।
प्रस्तुति- पूर्णिमा गुप्ता।

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