व्यंग्य- चिकने घड़े - आशीष दशोत्तर
व्यंग्य-
चिकने घड़े
- आशीष दशोत्तर
वे समझ से परे हैं। उनको समझना यानी खुद को भूलना।वे ऐसी उलझन हैं जिसे अच्छे-अच्छे नहीं सुलझा पाए । जो उन्हें नहीं समझ पाए वे उन्हें चिकना घड़ा बोलते हैं । चिकना घड़ा यानी उनके ऊपर कितना भी पानी डाला जाए कोई फ़ायदा नहीं।
किसी समय उनके ऊपर टपके पानी का कुछ अंश तो ठहरता था। तब उन्होंने अपने ज्ञान छिद्र खोल रखे थे। वक्त की गर्द उन पर धीरे -धीरे जमती रही। उन्हें जब महसूस हुआ कि बगैर ज्ञान के भी बेहतर समय गुज़ारा जा सकता है तो उन्होंने अपने ऊपर पड़ी गर्द हटाना बंद कर दिया। लिहाजा ज्ञान छिद्र बंद होते रहे। इस तरह वे साधारण से चिकने घड़े में रूपांतरित हो गए।
चिकनी-चुपड़ी बातों में उनका कोई सानी नहीं।उनके चिकने चेहरे पर कोई मोहित न भी हो मगर बातों में तो उलझता ही। जो उनकी बातों में आ जाए तो उसे कुछ समझ ही नहीं आए। उनके पास बातों का खज़ाना है। दुनिया की ऐसी कोई घटना नहीं है जिसके साक्षी वे न रहे हों। किसी भी घटना का ज़िक्र हो तो वे उससे जुड़ा अपना अनुभव बताना नहीं भूलते। बताते भी इतना तफ़्सील से कि उतने वक्त में तो पूरी घटना ही हो जाए।
उनके इस अनुभवजन्य ज्ञान से कई लोग उकता गए। उन्हें इसका अहसास भी करवा दिया कि वे यह सब कह कर वक्त जाया कर रहे हैं, मगर उन पर इसका कोई असर नहीं होता । अगर वे लोगों की बातों पर ध्यान देते तो इतने चिकने कैसे होते ?
उनके मुंह से एक ही बात को बार-बार सुनने वालों को कई बार हंसी आ जाती ,मगर वे इस बात का बुरा नहीं मानते । अपने मन की बात कहे जाते। वे मानते कि महान लोगों के साथ ऐसा होता ही है। सामने तो लोग उनकी बात सुनते हुए हंसते हैं मगर बाद में दुनिया उनकी बातों को याद रखती हैं।
उनकी इस प्रवृत्ति से चिकनाई में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती रहती । इसी चिकनाई की वजह से वे कहीं भी प्रवेश कर सकते थे और कहीं से भी निकल सकते थे । किसी भी मसले में उनका अचानक प्रवेश कर जाना अप्रत्याशित नहीं होता। उनकी उपस्थिति पर कोई आश्चर्य नहीं करता । कोई बुरा भी नहीं मानता । अलबत्ता सब उन्हें उपस्थित देख अपना सर पकड़ लेते। मगर वे वहां पहुंच कर भी अपनी ही ताल ठोकते और शुरू हो जाते । कभी कोई मुंह पर सीधे-सीधे भी कह देता,उन्हें ज़लील भी कर देता, तो भी वे इसका बुरा नहीं मानते। 'सुनना सब की, करना मन की' उनका यह सूत्र वाक्य रहा और इसे पकड़ कर वे निरंतर आगे बढ़ते रहे।
उनकी चिकनाई में निरंतर वृद्धि हो रही है। अब वे इस कदर चिकने हो चुके हैं कि उन पर पानी की बूंद ठहरना तो ठीक किसी का हाथ भी नहीं ठहरता । अब वे किसी की पकड़ में नहीं आते। हालांकि उन्हें कोई पकड़ना भी नहीं चाहता ,मगर वह इतने चिकने हो चुके हैं कि सब की पकड़ से दूर ही रहते हैं । चुनाव के समय कभी किसी दल ने उन्हें पकड़ा तो वे अपनी चिकनाई का प्रयोग कर वहां से निकल भागे। दूसरे दल ने पकड़ा तो वहां भी यही हथकंडा अपनाते हुए निकल भागे। वे इधर से उधर घूम रहे हैं । अपने चिकने स्पर्श से इधर की उधर भी कर रहे हैं । वे कभी आप तक भी पहुंचेंगे । आप उन्हें चिकने घड़े मानकर छोड़ दें तो ही बेहतर है।
-12/2, कोमल नगर
बरबड़ रोड़
रतलाम-457001
मो.9827084966












