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स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव
स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। दोनों कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
प्रातःकालीन प्रवचन में आचार्य श्री विशोकानंद भारती ने नाम-स्मरण की महिमा बताते हुए कहा कि नाम की कमाई ऐसी है कि उसके प्रभाव से बड़े-बड़े पापी भी संसार-सागर से तर गए। उन्होंने तुलसीदास जी की भक्ति परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भगवान के नाम में इतनी शक्ति है कि निरंतर नाम-स्मरण करने वाला व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
उन्होंने कहा, “जागो सोने वालों, जगाने वाला आ गया, अज्ञान को मिटाने वाला आ गया।” महाभारत के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य बाहर से देखने में सक्षम होते हुए भी भीतर से अंधा हो सकता है। जिनकी बाहरी आंखें बंद होती हैं, उनकी आंतरिक दृष्टि जागृत हो सकती है, लेकिन मनुष्य को अपने भीतर के अज्ञान का भी ऑपरेशन करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भगवान मनुष्य को भीतर देखने की दृष्टि देते हैं और आत्मचिंतन के माध्यम से अंतर्मन का अंधकार दूर किया जा सकता है।
आचार्य श्री ने कहा कि सूरदास सूर्य के समान और तुलसीदास चंद्रमा के समान हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को दूसरों की बातों में उलझने के बजाय संतों के वचनों को सुनकर आत्मचिंतन करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि कई लोगों की प्रवृत्ति महात्माओं की बात सुनने के बजाय अपनी बात सुनाने की होती है। जब तक मनुष्य संसार के मोह-माया के खूंटे से बंधा रहेगा, तब तक उसकी आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती। उन्होंने समझाया कि मनुष्य को बंधनों में जकड़े बैल की तरह जीवन नहीं बिताना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मूर्ख व्यक्ति अक्सर मूर्खों की संगति में ही प्रसन्न रहता है। गुरु और शिष्य के संबंध पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि केवल अधिक पढ़ा-लिखा होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सीखने की भावना भी आवश्यक है।
“पुजारी को दर्शन नहीं, भक्त को दर्शन क्यों?” विषय पर उन्होंने कहा कि भगवान के दर्शन पद, अधिकार या कर्मकांड से नहीं, बल्कि निर्मल भाव, निष्काम प्रेम और पूर्ण समर्पण से होते हैं। पुजारी भगवान की सेवा करता है, जबकि भक्त भगवान के प्रति तीव्र प्रेम और तड़प लेकर आता है। भगवान भाव के भूखे हैं, केवल रस्मों के नहीं।
उन्होंने कहा कि जहां ‘मैं’ का भाव समाप्त होता है, वहीं से भगवान की अनुभूति प्रारंभ होती है। भक्त अपने अहंकार और अधिकार को छोड़कर स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित करता है। मीरा बाई और शबरी के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उनकी भक्ति में पद या अधिकार नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण था। इसी कारण भगवान ने उनकी भक्ति स्वीकार की।
सायंकालीन श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य श्री ने कहा कि “प्रथम भक्ति संतन कर संगा” अर्थात संतों की संगति भक्ति का प्रथम सोपान है। उन्होंने बताया कि शास्त्रों में हजारों मंत्रों का उल्लेख है तथा कर्म, उपासना और ज्ञान के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग बताया गया है। उन्होंने कहा कि तीर्थयात्रा और सत्संग भी आध्यात्मिक जीवन में महत्वपूर्ण हैं। केवल घर में बैठे रहने से साधना की पूर्णता नहीं होती। श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के साथ किया गया प्रयास जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करता है।
आचार्य श्री ने श्रद्धालुओं से संतों की संगति, नाम-स्मरण, तीर्थ और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भगवान किसी की नौकरी, पद या बाहरी पहचान नहीं देखते, बल्कि भक्त के हृदय का भाव देखते हैं।
प्रवचन के पश्चात आश्रम में आरती संपन्न हुई। आरती में आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु, भक्त, महिलाएं एवं पुरुष उपस्थित रहे।











