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दिव्य चातुर्मास महोत्सव में कठोपनिषद, गुरु-शिष्य परंपरा और श्रीमद्भागवत कथा पर दिया आध्यात्मिक संदेश
रतलाम, 1 अगस्त। श्री अखंड ज्ञान आश्रम में 31 जुलाई से 26 सितंबर 2026 तक आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत शनिवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर, मंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद भारती जी महाराज ने अपने प्रेरक उद्बोधन में गुरु-शिष्य परंपरा, विवेक, आत्मज्ञान तथा सनातन धर्म के विभिन्न आध्यात्मिक सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कठोपनिषद की व्याख्या करते हुए स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने कहा कि यदि गुरु तेजस्वी है तो शिष्य को भी तेजस्वी बनना होगा, क्योंकि आगे चलकर शिष्य को ही गुरु का दायित्व निभाना है। उन्होंने कहा कि जैसे गृहस्थ अपने योग्य पुत्र की कामना करता है, उसी प्रकार गुरु भी योग्य एवं संस्कारित शिष्य चाहता है। गुरु और शिष्य दोनों का तेजस्वी होना आवश्यक है, तभी ज्ञान परंपरा सुदृढ़ बनी रहती है।
उन्होंने अपने आध्यात्मिक जीवन का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि वर्ष 1974 के कुंभ मेले में उनके काका गुरुओं ने उन्हें निर्वाण पीठाधीश्वर आचार्य श्री की गोद में बैठाया था। गुरु के तेज, ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति से उन्होंने स्वयं को निरंतर "चार्ज" किया। वर्ष 1981 में वे गुरु के अनुरूप प्रतिष्ठित हुए और वर्ष 2014 में गुरु के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उन्हें गुरु की आध्यात्मिक परंपरा के साथ पीठ का दायित्व भी प्राप्त हुआ।
स्वामी जी ने कहा कि शास्त्रों में गुरु और शिष्य दोनों के स्पष्ट लक्षण बताए गए हैं ताकि दोनों मार्ग से विचलित न हों। उन्होंने कहा कि साधु पलायनवादी नहीं, बल्कि परीक्षणवादी और निरीक्षणवादी होता है तथा बिना परीक्षण के अपनी शक्ति का उपयोग करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि ऋषि दो प्रकार के होते हैं—ब्रह्मर्षि और राजर्षि। गृहस्थ जीवन में रहने वाले साधक राजर्षि हैं, जो साधना और आत्मचिंतन के माध्यम से आगे चलकर ब्रह्मर्षि बनने की दिशा में अग्रसर होते हैं।
अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि आश्रम आत्मिक शांति, विवेक और आध्यात्मिक उन्नति का केंद्र है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि देवता अथवा गुरु के स्थान पर कभी भी खाली हाथ न जाएं, क्योंकि यह श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक है।
सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ हुआ। कथा के पूर्व पोथी पूजन नगर निगम के पूर्व अध्यक्ष दिनेश पोरवाल ने किया।
भागवत कथा के प्रारंभिक उद्बोधन में स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने कहा कि वास्तविक विवेक आध्यात्मिक साधना और सत्संग से प्राप्त होता है। उन्होंने भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक प्राणी में एक ही परमात्मा का वास है, इसलिए सभी के प्रति समभाव रखना चाहिए। उन्होंने गीता के 16वें अध्याय में वर्णित दैवी और आसुरी संपदा का अध्ययन करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि संत समाज मानव को आध्यात्मिक रूप से परिपक्व बनाता है। प्रयागराज में हुए शास्त्रार्थ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संतों की पूजा पहले किए जाने का निर्णय इसलिए हुआ क्योंकि संत ही साधारण मनुष्य को साधना के माध्यम से दिव्य व्यक्तित्व प्रदान करते हैं।
स्वामी जी ने परिवार में सत्संग की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि पति-पत्नी दोनों यदि नियमित रूप से सत्संग करेंगे तो उनके विचार शुद्ध होंगे और पारिवारिक कलह स्वतः समाप्त हो जाएगी। उन्होंने गुरु-शिष्य, पति-पत्नी तथा भक्त-भगवान के संबंधों में समान विचार और पारस्परिक समझ की आवश्यकता पर भी विशेष बल दिया।
कार्यक्रम के अंत में महाआरती के पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई। चातुर्मास महोत्सव में अखंड ज्ञान आश्रम के संतगण, महिला एवं पुरुष श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।



















