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गुरु की आज्ञा का पालन ही शिष्य को सिद्धि और मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है : महामंडलेश्वर श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती
स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में चल रहे दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत मंगलवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर, परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद भारती जी महाराज के सान्निध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि गुरु की आज्ञा का निष्ठापूर्वक पालन ही शिष्य को सिद्धि, कल्याण और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करता है।
कठोपनिषद की व्याख्या करते हुए स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने नचिकेता और यमराज के संवाद का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि नचिकेता तीन दिन तक यमलोक में बिना अन्न-जल ग्रहण किए प्रतीक्षा करता रहा। यमराज के लौटने पर उनकी धर्मपत्नी ने स्मरण कराया कि तीन दिन से एक ब्राह्मण अतिथि भूखा-प्यासा प्रतीक्षा कर रहा है। अतिथि सत्कार के उपरांत यमराज ने प्रसन्न होकर नचिकेता को तीन वरदान देने का संकल्प लिया। पहला वरदान नचिकेता ने अपने पिता के क्रोध शांत होकर प्रसन्न होने का मांगा। इसके माध्यम से उन्होंने बताया कि सच्चा साधक सदैव अपने माता-पिता एवं परिवार के कल्याण की कामना करता है।
उन्होंने कहा कि कर्मकांड एवं यज्ञ केवल विधि-विधान से ही सफल होते हैं। शास्त्रों में निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सत्संग सुनना भी एक विधि है और बिना विधि के किया गया कार्य पूर्ण फल नहीं देता। भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि तामसी कर्म अविवेकपूर्ण, राजसी कर्म इच्छाओं से प्रेरित तथा सात्विक कर्म केवल परमात्मा की प्रसन्नता के लिए किया जाता है।
स्वामी जी ने आश्रम व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—चारों आश्रमों का विशेष महत्व है। व्यक्ति को आयु एवं जीवन की अवस्था के अनुसार धर्मानुकूल आचरण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संत कथा को आदरपूर्वक सुनना और शास्त्रों के अनुरूप जीवन जीना ही आत्मकल्याण का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि संसार का सबसे बड़ा तीर्थ विशुद्ध मन है। गुरु के शरीर, संस्था, संस्कार, साधुता एवं सेवा कार्यों की निष्ठापूर्वक सेवा करना ही वास्तविक गुरु सेवा है। केवल औपचारिकता से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त नहीं होता। भगवान श्रीराम का स्मरण कराते हुए उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा सेवक वही है जो अनुशासन का पालन करता है।
गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रकाश डालते हुए स्वामी जी ने कहा कि शिष्य की परीक्षा अत्यंत आवश्यक होती है। गुरु शिष्य के धैर्य, समर्पण और आज्ञापालन की परीक्षा लेते हैं। उन्होंने एक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि वर्षों की सेवा के बाद भी गुरु शिष्य की निष्ठा की परीक्षा लेते हैं। इसलिए गुरु की आज्ञा सदैव अविचारणीय होती है, क्योंकि गुरु जो कहते हैं, वह शिष्य के हित और आध्यात्मिक उत्थान को ध्यान में रखकर कहते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला ही जन्म-मरण के चौरासी लाख योनियों के चक्र से मुक्त हो सकता है।
उन्होंने बताया कि यमराज ने नचिकेता को दूसरा वर यज्ञ-विधान तथा तीसरे वर में अग्नि विज्ञान का ज्ञान प्रदान किया। यही विद्या आगे चलकर 'नचिकेता अग्नि विद्या' के नाम से प्रसिद्ध हुई।
सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा में स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने कहा कि श्री अखंड ज्ञान आश्रम प्रत्येक साधक की शरणस्थली है, लेकिन उसके लिए पहले शरणागत होना सीखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भगवान के समक्ष केवल सांसारिक मांगों का आग्रह करने के बजाय स्वयं को उनके प्रति समर्पित करना चाहिए। यदि व्यक्ति की गति और मति दोनों सही हों तो वह अपने लक्ष्य तक अवश्य पहुंचता है।
भगवान श्रीराम और विभीषण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति निष्कपट भाव से भगवान की शरण में आता है, भगवान उसे अपने प्राणों के समान स्वीकार करते हैं। भगवान श्रीराम ने विभीषण को शरण देकर यह संदेश दिया कि सच्चे शरणागत का कभी परित्याग नहीं किया जाता।
भागवत महात्म्य की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि 'भा' का अर्थ प्रकाश, 'ग' का अर्थ भगवान की ओर गति, 'व' का अर्थ भगवान का संरक्षण तथा 'त' का अर्थ संसार-सागर से तारने वाला है। जो भक्त श्रीमद्भागवत के संदेश को जीवन में उतारता है, वह भवसागर से पार हो जाता है।
कार्यक्रम में सायंकालीन महाआरती के मुख्य यजमान जनक नागल एवं अनिल झालानी रहे। आरती के पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई। इस अवसर पर अखंड ज्ञान आश्रम के संतगण, श्रद्धालु, महिलाएं एवं पुरुष बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
अखंड ज्ञान आश्रम के स्वामी स्वरूपानंद जी ने सभी भक्तों से आग्रह किया है कि प्रवचन के समय अपना मोबाइल बंद रखें।


















