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राग-द्वेष के बीच वैराग्य का मार्ग ही मुक्ति का मार्ग : महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती महाराज
रतलाम, ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय तथा सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा एवं प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किया।
कठोपनिषद के स्वाध्याय के दौरान आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती ने कहा कि जीवात्मा की इच्छाओं और मांगों का कोई अंत नहीं है। एक मांग पूरी होती है तो दूसरी उत्पन्न हो जाती है और दूसरी पूरी होते ही तीसरी की इच्छा जन्म ले लेती है। मनुष्य थोड़े से अधिक की ओर निरंतर आकर्षित रहता है। उसे जो 99 चीजें प्राप्त हैं, उनका सुख अनुभव नहीं करता, लेकिन जो एक चीज नहीं मिली, उसका दुख जीवनभर बना रहता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार में स्वयं को स्थायी समझकर जीवन व्यतीत करता है, जबकि संसार में कुछ भी नित्य नहीं है। यमराज यदि जीवन के कुछ अतिरिक्त क्षण भी दे दें, तब भी संसारी मनुष्य अपनी इच्छाओं और मोह-माया से मुक्त नहीं हो पाता। जीव को अपने कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है।
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को सदैव अपनी गति, मति और स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। जो कर्म भूतकाल में हो चुके हैं, उन्हें बदला नहीं जा सकता। उन्होंने रामसेतु का उदाहरण देते हुए कहा कि समुद्र पर सेतु भगवान श्रीराम ने बनाया, रावण ऐसा नहीं कर पाया। इसी प्रकार मनुष्य अपने बीते हुए कर्मों को सुधार नहीं सकता, लेकिन वर्तमान को सही दिशा देकर भविष्य को अवश्य बेहतर बना सकता है।
उन्होंने कहा कि मृत्यु के समय केवल आत्मा शरीर से जाती है। शरीर, धन-दौलत, जमीन-जायदाद और संसार की सभी वस्तुएं यहीं रह जाती हैं। कोई भी व्यक्ति अपने साथ पृथ्वी की संपत्ति लेकर नहीं जाता। इसलिए मनुष्य को जीवन रहते हुए अपने कर्म, साधना और ईश्वर भक्ति पर ध्यान देना चाहिए।
संसार में राग, द्वेष और वैराग्य के तीन मार्ग
प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने भगवान विष्णु एवं गरुड़ की कथा का उल्लेख करते हुए गरुड़ की माता विनीता के प्रसंग को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने संसार की विविध स्थितियों का वर्णन करते हुए कहा कि कहीं वेदों की ध्वनि गूंजती है, कहीं वीणा के स्वर सुनाई देते हैं और कहीं मनुष्य शोक में व्याकुल दिखाई देता है। यही संसार का स्वरूप है।
उन्होंने कहा कि संसार में मुख्य रूप से तीन रास्ते हैं—राग, द्वेष और वैराग्य। संसारी मनुष्य अधिकांशतः राग और द्वेष के बीच भटकता रहता है, जबकि अखंड ज्ञान आश्रम वैराग्य और आत्मज्ञान के मार्ग की ओर ले जाने का प्रयास करता है।
उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से पांडवों के लिए केवल पांच गांव मांगे थे, लेकिन दुर्योधन ने सुई की नोक के बराबर भूमि देने से भी इनकार कर दिया। उसके भीतर का द्वेष इतना प्रबल था कि उसने युद्ध का मार्ग चुन लिया। इसी प्रकार राग और द्वेष मनुष्य के विवेक को प्रभावित कर उसे गलत दिशा में ले जाते हैं।
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि वे सत्संग में केवल शरीर से उपस्थित न रहें, बल्कि मन से भी सत्संग में जुड़ें। सत्संग समाप्त होते ही यदि उसकी बातें भूल जाएं तो उसका वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं हो सकता। राग और द्वेष के बीच त्याग और वैराग्य का मार्ग मौजूद है, लेकिन मनुष्य उसे पकड़ने के लिए तैयार नहीं है।
प्रारब्ध से लड़ते हुए भगवान का भजन करें
उन्होंने कहा कि संसार में आने के बाद मनुष्य के पास सबसे बड़ा साधन भगवान का भजन है। अपने प्रारब्ध को स्वीकार करते हुए उससे संघर्ष करना और ईश्वर का स्मरण करते रहना ही जीवन की सही दिशा है।
उन्होंने कहा कि कथा, यज्ञ और साधना में विघ्न उत्पन्न करने वाली शक्तियों से सावधान रहना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान ने सदैव असुर प्रवृत्तियों का नाश कर धर्म की स्थापना की है।
सेवा के बाद सत्संग, तभी मिलेगा भक्ति का फल
सायंकाल आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में महामंडलेश्वर पीठाचार्य ने नवधा भक्ति के सभी नौ स्वरूपों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि भक्ति के नौ प्रमुख अंग हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन।
उन्होंने कहा कि पहले सेवा और फिर सत्संग होना चाहिए। जब तक मनुष्य सेवा के माध्यम से अपने मन को ईश्वर के प्रति समर्पित नहीं करता, तब तक सत्संग का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। सेवा मन को ईश्वर की ओर लगाती है और भजन के माध्यम से मनुष्य ईश्वर से शक्ति प्राप्त करता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य मनु की संतान है। गृहस्थ जीवन में पुरुष सफल होकर नारायण बन सकता है और स्त्री सफल होकर नारायणी बन सकती है। गृहस्थ जीवन त्याग का विरोधी नहीं, बल्कि साधना और सेवा का महत्वपूर्ण माध्यम है।
आचार्यश्री ने मोह-माया से मुक्त होने का संदेश देते हुए कहा कि शास्त्र मनुष्य को जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर वैराग्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। जब जीवन में सांसारिक दायित्वों की पूर्ति हो जाए, तब मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ना चाहिए। मोह को अपने साथ लेकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए, अन्यथा जीव जन्म-मरण के चक्र में भटकता रहता है।
मोबाइल काउंटर पर जमा कराने का आग्रह
आश्रम की ओर से महामंडलेश्वर श्री देव स्वरूपानंद जी ने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि प्रवचन के दौरान मोबाइल फोन बंद रखें अथवा आश्रम के मोबाइल काउंटर पर जमा कर दें, ताकि कथा एवं प्रवचन में श्रावकों को किसी प्रकार की परेशानी न हो। उन्होंने विशेष रूप से आग्रह किया कि प्रवचन समाप्त होने के बाद अपना मोबाइल काउंटर से लेना न भूलें।
आरती के अवसर पर रिटायर्ड डीएसपी भूपेंद्र सिंह राठौर, किशोर सिंह चौहान, श्री राजपूत नवयुवक मंडल ट्रस्ट हाथीखाना, शंभू जी की बावड़ी, जगन्नाथ मंदिर के पदाधिकारी एवं सदस्य, प्रवीण कुमार झालानी, अनिल झालानी, सुरेश पापटवाल सहित आश्रम के संतगण एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिला-पुरुष उपस्थित रहे।#rtmnewstoday #rtm #news #ratlam #ratlamnews #ratlamlocalnews


















