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सत्य के समान कोई धर्म नहीं, अधर्म से बढ़ा धन देता है दुख : आचार्य श्री
स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत मंगलवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। कथा एवं प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती ने गंगा अवतरण की कथा का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि हरिद्वार में गंगा की सात धाराएं मानी गई हैं। उन्होंने शिव, गंगा और राजा भगीरथ से जुड़े प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भागीरथ जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो गंगा अदृश्य हो जाती हैं और ऋषि जह्नु के आश्रम में प्रवेश कर जाती हैं। ऋषि जह्नु द्वारा गंगा को अपनी जंघा से बाहर निकालने के कारण गंगा का एक नाम ‘जाह्नवी’ भी पड़ा।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव की जटाओं से निकली गंगा केवल जल की धारा नहीं, बल्कि ज्ञान का भी प्रतीक है। भागीरथी गंगा से भी श्रेष्ठ ज्ञान गंगा है। इसमें स्नान करने का अर्थ है अपने अंतःकरण को ज्ञान और सद्विचारों से शुद्ध करना। केवल गंगा के किनारे रहने मात्र से व्यक्ति पवित्र नहीं होता। इसका उदाहरण धृतराष्ट्र और गांधारी हैं, जिनके जीवन में गंगा का सानिध्य रहा, लेकिन वास्तविक शुद्धि सत्संग और सदाचार से हुई।
आचार्य ने कहा कि मनुष्य को ईमानदारी से व्यापार और व्यवहार करना चाहिए। सत्य के समान कोई धर्म नहीं है। सत्य संसार में पहले हारता हुआ दिखाई देता है, लेकिन अंततः उसकी विजय होती है, जबकि असत्य पहले जीतता हुआ नजर आता है और बाद में पराजित होता है। उन्होंने कहा कि अधर्म से अर्जित धन बढ़ सकता है, लेकिन वह व्यक्ति को सुख और शांति नहीं देता। धन आने के बाद मनुष्य जब दूसरों पर शासन करने और सब कुछ अपने नियंत्रण में रखने की इच्छा करने लगता है, तब उसके पतन का मार्ग भी प्रशस्त हो जाता है।
उन्होंने कहा कि संसार में दूसरों का शोषण करने वाले बहुत हैं, लेकिन मनुष्य को अपने कर्म और धर्म का विचार करते हुए जीवन जीना चाहिए। वर्ण व्यवस्था को भी उन्होंने जीवन की प्राकृतिक व्यवस्था से जोड़ते हुए समझाया। उन्होंने कहा कि बाहर की तृष्णा मिथ्या है, वास्तविक संपत्ति तो ‘राम रतन धन’ है, जिसकी प्राप्ति सत्संग, साधना और सदाचार से होती है।
महाभारत के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए आचार्य ने कहा कि जीवन के अंतिम समय में भी मनुष्य के भीतर परिवर्तन संभव है। धृतराष्ट्र और गांधारी ने भी अंत समय में वैराग्य का मार्ग अपनाया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों के भाष्य का अर्थ विस्तृत व्याख्या है और शंकराचार्य के भाष्य में जीवन, कर्म और मोक्ष के गूढ़ तत्वों को समझाया गया है। सत्संग सुनने के बाद धृतराष्ट्र द्वारा अपने भविष्य पर उसके प्रभाव के संबंध में प्रश्न करने का प्रसंग भी उन्होंने सुनाया।
आचार्य श्री ने कहा कि कर्मयोग और वैराग्य के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति आगे चलकर संन्यास की ओर अग्रसर होता है। गुरु के सानिध्य और गुरुकुल जीवन के संस्कार मनुष्य को श्रेष्ठ जीवन की दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक गुरु के पास रहकर ज्ञान प्राप्त करने और संसार की आसक्ति से उदासीन होने वाला साधक जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
श्रीमद्भागवत के प्रसंग में उन्होंने राजा परीक्षित का उल्लेख करते हुए कहा कि राजा परीक्षित गंगा के तट पर बैठकर सत्संग और भागवत श्रवण करते हैं। तक्षक के आगमन की भविष्यवाणी के बावजूद उन्होंने अपना समय सत्संग और भगवान के स्मरण में लगाया। आचार्य ने श्रद्धालुओं से कहा कि ‘मरना सीखो’ और मृत्यु पर भी चिंतन करो। साधु-महात्माओं से जीवन के साथ-साथ मृत्यु के सत्य के बारे में भी पूछना चाहिए, क्योंकि मृत्यु का स्मरण मनुष्य को जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से संस्कारों को जीवन में उतारने का आह्वान करते हुए कहा कि आरती के समय सभी श्रद्धालुओं को उपस्थित रहना चाहिए। आरती के समय बैठे रहना और भागवत कथा के समापन संस्कारों में सहभागी न होना भागवत का अपमान है। उन्होंने कहा कि कथा केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि उसके संस्कारों को जीवन में धारण करने के लिए है।
आरती के अवसर पर भाजपा पुर्व जिलाध्यक्ष व प्रदेश कार्य समिति सदस्य बजरंग पुरोहित तथा प्रसादी की व्यवस्था राजा भैया विश्वकर्मा, छतरपुर की ओर से रखी गई। इस अवसर पर आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु, भक्तजन, महिलाएं एवं पुरुष उपस्थित रहे ।#rtmnewstoday #rtm #news #ratlam #ratlamnews #ratlamlocalnews










