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रतलाम की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक धरोहर: 'सुनें सुनाएं' का गौरवशाली सफर
रतलाम। किसी भी जीवंत शहर की वास्तविक आत्मा और पहचान वहां के निवासियों की रचनात्मकता और बौद्धिक चेतना से झलकती है। जब तक किसी नगर में सृजनशीलता का प्रवाह बना रहता है, तब तक वह शहर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा न होकर एक सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बना रहता है। इन्हीं उदात्त विचारों के बीच मध्य प्रदेश के रतलाम शहर में रचनात्मक वातावरण का निर्माण करने और सुधिजनों को पठन-पाठन की परंपरा से जोड़ने के उद्देश्य से संचालित अनूठे आयोजन 'सुनें सुनाएं' ने अपने सफल चार वर्ष पूर्ण कर पांचवें वर्ष में प्रवेश कर लिया है।स्थानीय जी.डी. अंकलेसरिया रोटरी हॉल में आयोजित 'सुनें सुनाएं' के 49वें सोपान (सत्र) में रतलाम के कई वरिष्ठ साहित्यकारों, प्रबुद्ध नागरिकों और कला-प्रेमियों का जमावड़ा रहा। कार्यक्रम में मौजूद प्रबुद्धजनों ने आयोजन की निरंतरता, स्व-अनुशासन और अनुकरणीय समयबद्धता की भूरि-भूरि प्रशंसा की। वक्ताओं ने रेखांकित किया कि पिछले अड़तालीस महीनों के निरंतर सफर में विपरीत परिस्थितियों के बावजूद न तो इस कार्यक्रम का दिन बदला गया और न ही इसका समय।चार वर्षों की ऐतिहासिक उपलब्धि और आंकड़ेपिछले चार वर्षों के इस रचनात्मक सफर पर दृष्टि डालें, तो 'सुनें सुनाएं' मंच ने नगर में अध्ययन व वाचन की एक नई संस्कृति को जन्म दिया है।48 महीनों का निरंतर प्रवाह: बिना किसी रुकावट के लगातार 48 महीनों तक हर माह यह कार्यक्रम आयोजित किया गया।500 से अधिक पाठक: अब तक 500 से अधिक रचना-प्रेमियों ने मंच पर उपस्थित होकर अपने पसंदीदा कालजयी साहित्यकारों की कृतियों का सुपाठ किया है।1500 से अधिक श्रोता-दर्शक: इस अभियान से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 1500 से अधिक साहित्य-प्रेमी, विद्यार्थी और सुधिजन जुड़ चुके हैं।अनुशासन एवं समयबद्धता: निर्धारित समय पर ठीक प्रारंभ होना और तय सीमा में संपन्न होना इस आयोजन का सबसे मजबूत स्तंभ रहा है।'सुनें सुनाएं' आयोजन की अनूठी विशेषताएं एवं नियम'सुनें सुनाएं' रतलाम का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण क्षेत्र का एक ऐसा एकमात्र और विशिष्ट साहित्यिक मंच है, जिसकी अपनी एक अलग कार्यशैली और आचार संहिता है:स्व-रचित साहित्य का निषेध: इस मंच की सबसे अनूठी शर्त यह है कि इसमें कोई भी वाचक अपनी लिखी हुई रचना का पाठ नहीं कर सकता।कालजयी और प्रिय रचनाकारों का सम्मान: वाचक को केवल अपने किसी प्रिय, सिद्ध या कालजयी साहित्यकार की रचना का ही चयन करना होता है।भूमिका-रहित वाचन: समय की बचत और मूल रचना के प्रभाव को बनाए रखने के लिए किसी भी प्रकार की लंबी औपचारिक भूमिका या भाषणबाजी की अनुमति नहीं होती। वाचक सीधे रचना पाठ प्रारंभ करता है।समय सीमा का कड़ाई से पालन: प्रत्येक वाचक के लिए समय सीमा निर्धारित होती है, जिसका पालन अनिवार्य रूप से किया जाता है।स्व-प्रेरणा से सहभागिता: यह पूरा आयोजन किसी मुख्य अतिथि, विशेष स्वागत या दिखावे के बिना, केवल शहरवासियों की साहित्यिक स्व-प्रेरणा से संचालित होता है।49वें सोपान में प्रस्तुत प्रमुख काव्य व गद्य रचनाएंकार्यक्रम के 49वें सोपान के दौरान शहर के विभिन्न आयु वर्ग और क्षेत्रों से आए रचना-प्रेमियों ने देश के ख्यातिलब्ध कवियों और लेखकों की रचनाओं का भावपूर्ण पाठ किया:वाचक का नाममूल रचनाकारप्रस्तुत रचनाछत्रपाल सिंह 'दाताहोकम'पंडित श्याम नारायण पांडे'थाल सजाकर किसे पूजने चले'कीर्ति शर्मारमेश रंजक'दमन की चक्की पीस रही इंसान'लाखन सिंह मीणाश्री सतीश सृजन'याज्ञसेनी'ओमप्रकाश मिश्रनिलेश मिसरा'हम अपने फ़ोन में ढूंढ क्या रहे हैं'सरिता दशोत्तरबच्चालाल उन्मेष'कौन ज़ात हो भाई?'विनोद झालानीअविनाश जोशी'आभार में है ताक़त बड़ी'कैलाश व्यासडॉ. शिवमंगल सिंह 'सुमन''कुछ बातें'यूसुफ़ जावेदीरतन चौहान'सरदार'अनीस ख़ानउदयप्रताप सिंह'फूल और कली'इन विविध प्रस्तुतियों के माध्यम से जहां एक ओर ओज, राष्ट्रभक्ति और पौराणिक चेतना के स्वर गूंजे, वहीं दूसरी ओर आधुनिक डिजिटल जीवनशैली की विसंगतियों और सामाजिक यथार्थ पर करारा व्यंग्य भी देखने को मिला।रतलाम के प्रबुद्ध समाज की गरिमामयी उपस्थितिइस विशेष अवसर पर रतलाम नगर के विभिन्न क्षेत्रों—शिक्षा, साहित्य, समाजसेवा, चिकित्सा और पत्रकारिता—से जुड़ी प्रमुख हस्तियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और आयोजन को सम्बल प्रदान किया।उपस्थित प्रमुख सुधिजन:प्रो. रतन चौहान, गुस्ताद अंकलेसरिया, डॉ. प्रदीप सिंह राव, अशोक अग्रवाल, ललित चौरड़िया, श्रीराम दिवे, मुकेश व्यास, ऋषिकेश शर्मा, सुभाष यादव, मांगीलाल नगावत, आई.एल. पुरोहित, मणिलाल पोरवाल, रीता दीक्षित, सांत्वना शुक्ला, गजेंद्र सिंह चाहर, आशा श्रीवास्तव, डॉ. गोविंद प्रसाद डबकरा, लक्ष्मी कुंवर, ज्योत्स्ना तिवारी, डॉ. गीता दुबे, नरेन्द्र तिवारी, प्रो. दिनेश राजपुरोहित, जितेन्द्र सिंह पथिक, यू.एल. जायसवाल, गजेन्द्र सिंह चौहान, शाश्वत आलोक, पद्माकर पागे, दुष्यंत कुमार व्यास, राजेन्द्र सेन, शैलेन्द्र शितूत, सत्यनारायण सोढ़ा, गफ्फार मंसूरी, हीरालाल खराड़ी, प्रकाश केरवार, ज्योति केरवार, वाजिद हुसैन ख़ान, महावीर वर्मा, आशीष दशोत्तर सहित बड़ी संख्या में साहित्य-अनुरागी उपस्थित रहे।सामाजिक व सांस्कृतिक प्रभावप्रबुद्धजनों का मानना है कि आज के त्वरित और डिजिटल युग में जब पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति घट रही है, तब रतलाम में 'सुनें सुनाएं' जैसा स्व-अनुशासित मंच एक ताजी हवा के झोंके की तरह है। यह न केवल युवा पीढ़ी में पठन-पाठन की संस्कृति को पुनर्जीवित कर रहा है, बल्कि समाज में साहित्यिक संवाद और बौद्धिक विमर्श के स्तर को भी ऊंचा उठा रहा है। पांचवें वर्ष में प्रवेश करते हुए यह आयोजन रतलाम शहर को सांस्कृतिक और रचनात्मक रूप से समृद्ध बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।













